Home National सावधानः भारत में नए वायरस ने दी दस्तक, हो सकता बेहद खतरनाक।

सावधानः भारत में नए वायरस ने दी दस्तक, हो सकता बेहद खतरनाक।

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वैसे तो भारत में कई प्रकार के वायरस होते है। लेकिन हाल ही में एक ऐसी खबर सामने आई है। जिसने सभी को सन्न करके रख दिया है। बताया जा रहा है। केरल के कोझीकोड में इन दिनों निफा नाम के खतरनाक वायरस का आतंक है। ये वहां लगातार फैल रहा है। इससे कई मौतों की खबर है।

साथ ही बताया जा रहा है कि इस वायरस से फैलने वाली बीमारी अलग अलग समय पर दुनिया में तबाही मचा चुकी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे ने तीन नमूनों में निफा वायरस की मौजूदगी पाई है। ये वायरस संक्रामक तौर पर महामारी का रूप ले सकता है।

वहीं इस वायरस को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, निफा वायरस (NiV) एक नई उभरती हुई बीमारी है, जो जानवरों और मनुष्यों दोनों में गंभीर बीमारी की वजह बनता है। इसे ‘निफा वायरस एन्सेफलाइटिस’ भी कहा जाता है। बता दें कि निफा वायरस से केरल में अब तक नौ लोगों की मौत हो चुकी है।

जानकारी हेतु यह बताया गया है कि इस बीमारी के लक्षण जिस किसी को निफा वायरस इन्फैक्ट करते हैं, उसे बुखार के साथ सिर दर्द, थकान, भटकाव, मेंटल कंफ्यूजन जैसी स्थितियां बनती हैं।

निफा वायरस के रोगी 24-48 घंटों के भीतर कोमा में जा सकते हैं। फिर मौत भी हो सकती है। इससे ब्रेन में सूजन आ जाती है। मलेशिया में जब ये बीमारी फैली, तो इसका इलाज करने वाले 50 फीसदी लोग मौत के शिकार बन गए।

आइए जानते है कि इस बीमारी में आखिरकार ऐसा है क्या जो इसकों और वायरस से अलग बनाती है। निफा नाम का वायरस संक्रामक बीमारी फैलाता है। ये 1998 में मलेशिया और 1999 में सिंगापुर में फैल चुका है।

ये पहले पालतू सुअरों के जरिए फैला और फिर कई पालतू जानवरों मसलन कुत्तों, बिल्लियों, बकरी, घोड़े और भेड़ में दिखने लगा। ये मनुष्यों पर तेजी से असर डालता है।

निफा वायरस को ये नाम सबसे पहले मलेशिया के एक गांव में फैलने के बाद दिया गया। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी सूची में शामिल किया हुआ है।
निफा वायरस टेरोपस जीनस नाम के एक खास नस्ल से फैलता है।

इसके फैलने के कारक कुछ इस प्रकार है कि ये बीमारी चमगादड़ों से फैलती है। ये वायरस चमगादड़ों के मूत्र में मौजूद रहते हैं। इसी तरह उसकी लार और शरीर से निकलने वाले द्रव में भी। पहले ये माना गया कि ये सुअरों से जरिए फैलता है लेकिन बाद में पता चला है कि ये वो सुअर थे।

जो चमगादड़ों से संपर्क में आए। ये वो चमगादड़ थे जो वनों के कटने और अन्य वजहों से अपने रहने की जगह से उजड़ गए थे। बाद में जब ये बीमारी वर्ष 2004 में बांग्लादेश में फैली तो पता लगा कि ये बीमारियां उन लोगों में आई, जिन्होंने वो कच्चा ताड़ का रस पिया, जहां चमगादड़ों का डेरा था।

भारत और बांग्लादेश जैसे देशों में ये बीमारी चमगादड़ों के जरिए सीधे मनुष्य से मनुष्य में ट्रांसमीट होती है। इसलिए जिन लोगों को ये बीमारी होती है, उनसे संपर्क में आने के लिए जरूरी सावधानियां बरतनी चाहिए। कुछ केस में रोगी को सांस संबंधित समस्‍या का भी सामना करना पड़ सकता है।

वहीं वैज्ञानिकों का तो यहाँ तक कहना है कि इसका कोई पुख्ता इलाज नहीं है। अभी तक इसकी कोई वैक्सीन नहीं बनी है।